Monday, March 9, 2009

कुछ भी तो नहीं बदला...

पिछले कई वर्षों से मैं बिहार नहीं गया था, लेकिन इस बार मौका मिला। मेरा सफर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से शुरू हुआ... ट्रेन करीब 3 घंटे लेट थी। ट्रेनों का लेट होना हमारे यहां सामान्य बात है। आमने-सामने की सीट पर कॉलेजों में पढ़नेवाले छात्र बैठे थे। ये बिहार का निम्न मध्यमवर्ग था जिसके सपने आसमान में उड़ने के थे...बिहार के लिए कुछ करने का इरादा था। इनके पास लैपटॉप, मोबाइल फोन जैसी चीजें भी थीं। पूरी दुनिया से बेखबर इनमें से कोई गाना सुनने में मस्त था...कोई अपने लैपटॉप पर कुछ सर्च करने में लगा हुआ था...और कोई न्यूज पढ़ने में मग्न था। गाड़ी भी अपनी रफ्तार से चल रही थी। दिल्ली से अलीगढ़ के बीच तो सब अपने में मग्न थे, लेकिन कुछ ही मिनटों में तीन बार ट्रेन के रुकने ने एक-दूसरे को
करीब ला दिया। इनमें से एक बोला "लालू यादव ने संसद में कहा कि हमने भारतीय रेल को हाथी से चीता बना दिया...यार मुझे तो लगता है उन्होंने घोड़े को गदहा बना दिया...तीन घंटे ट्रेन का लेट होना कोई मायने रखता है...जगह-जगह रुक रही है। सपने जापान की तरह बुलेट ट्रेन चलाने के हैं, लेकिन जो चल रही है उसकी हालत सुधारने की कोई बात नहीं कर रहा है।
देखिएगा पटना पहुंचे-पहुंचे जरुर 6-7 घंटे लेट हो जाएगी।" दूसरे ने बीच में ही कहा कि नेताओं ने तो बिहार का सत्यानाश कर दिया है। जो बिहार कभी इतना धनी और संपन्न हुआ करता था...जहां पढ़ने देश के कोने-कोने से छात्र आते थे...वहां के लड़के अब सीधे ट्रेन पकड़ कर बिहार से बाहर निकल जाते हैं, उन्हें बिहार में अपना भविष्य दिखाई नहीं देता। यही वजह है कि हमलोग अपने घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर गए हैं और जो एक बार यहां से निकल जाता है वो शायद ही वापस लौटता है। उस लड़के की बात में दर्द भी था और दम भी। बिहार के जितने लोगों से मैं दिल्ली और दूसरी जगहों पर मिला हूं, कोई वापस जाने का नाम नहीं लेता। ज्यादातर अपना भविष्य दूसरी जगहों पर ही तलाशते हैं। अचानक मैंने पूछा, " बिहार के लिए क्या किया जा सकता है ? " सबकी अपनी-अपनी राय थी। कोई नहरों के जाल बनाने की बात कर रहा था...कोई कल-कारखाने लगाने की...कोई लॉ-ऑडर को ठीक करने की। पूरी रात और दिन बातों में ही कट गया। मेरा स्टेशन डुंमराव आनेवाला था...वाकई अब तक ट्रेन करीब साढ़े छह घंटे लेट हो चुकी थी। वहां से मुझे करीब बीस किलोमीटर दूर गंगा के किनारे एक गांव में जाना था। रास्ता परिचित था...एक लंबे समय के बाद इस रास्ते से गुजर रहा था इसलिए एक-एक चीज को याद करने में लगा हुआ था। सब कुछ वही था...कुछ ज्यादा नहीं बदला। अब मिनी बस और जीप के साथ ऑटो भी इस रुट पर आ चुके थे। जिस रास्ते से मैं गुजर रहा था...रोड़ की हालत में ज्यादा बदलाव नहीं आया था। बीस किलोमीटर का सफर 2 घंटे में पूरा करके मैं अपने गांव पहुंच चुका था। वहां गजब की शांति थी, रह-रह कर फूलों की खूशबू आ रही थी, सामने ही कई किलोमीटर तक चारों ओर गेहूं और चने की फसल भी लहलहा रही थी। बस जिस एक चीज की वहां कमी खल रही थी वो थी लोगों की...ज्यादातर लोग वहां से जा चुके थे।

Friday, February 13, 2009

नेता नहीं, लीडर चाहिए !

कई साल पहले की बात है। मैं बिहार के डुमरांव रेलवे स्टेशन पर एक पेड़ के नीचे बैठा अपनी ट्रेन का इंतजार कर रहा था। खुला आसमान...सूरज का तेज लोगों को पसीना-पसीना किए हुए था। पास ही एक हैंडपंप था...जहां लोगों की भारी भीड़ लगी हुई थी। दो लोग अपनी प्यास बुझाने के बाद...मेरे ही बगल में आकर बैठ गए और आपस में बातचीत करने लगे। एक ने कहा भाई, मैं तो बड़ा परेशान हूं..."बाबूजी ने बहन को पढ़ा लिखा कर इंजीनियर तो बना दिया...लेकिन अब उसके लिए लड़का कहां से खोजें ! इंजीनियर लड़की के लिए कम-से-कम डॉक्टर लड़का तो चाहिए ही! सिपाही का भी दहेज एक लाख रुपये और मोटर साइकिल मांग रहे हैं...बाबूजी ने तो सारी कमाई हमलोगों को पढ़ाने लिखाने में लगा दी। कोई भी इंजीनियर, डॉक्टर चार-पांच लाख से कम थोड़े ही लेगा। हमलोगों के पास रुपया है नहीं और अब किसी अच्छे लड़के के दरवाजे पर जाने की हिम्मत नहीं हो रही है...समझ में नहीं आ रहा है- क्या करें । " दूसरे ने कहा "बेवकूफ हो डॉक्टर, इंजीनियर और सिपाही-दारोगा न दहेज मांगेगा...हर गांव में दस लड़के कुर्ता-पाजामा पहन कर घूम रहें हैं...किसी भी ठीक-ठाक लड़के को देखकर शादी कर दो...आगे उसकी किस्मत"। इस घटना के करीब 15 साल से अधिक हो चुके हैं...लेकिन इसका मतलब अब धीरे-धीरे समझ में आ रहा है। तब बेरोजगारी और बेकारी ने हर गांव में कुछ लोगों को नेता बना दिया...आज उनकी तादाद सैकड़ों में हो गई है। इनका नेता बनना मजबूरी थी, लेकिन इनके पास दूसरा कोई रास्ता नहीं था। अब देश के अंदर न जाने कितने करोड़ नौजवान नेता बन गए हैं। समाजसेवा के लिए नहीं, बल्कि इसलिए की उनके पास कोई काम नहीं है। हज़ारों में किसी एक को कामयाबी मिलती है...उसका करियर संवरता है...लेकिन बाकी उम्मीदों का दामन पकड़े अपनी मंजिल की तलाश में भटक रहे हैं। देश में हर जगह नेता ही नेता दिखाई देते हैं, लेकिन एक भी ऐसा लीडर दिखाई नहीं देता जो इस देश को एक दिशा दे सके। ज्यादातर का एक ही मकसद दिखाई देता है, किसी तरह से उसे टिकट मिले और उसका जीवन संवरे। लेकिन कितनों का जीवन संवरेगा। राजनीति भी अब जमीन-जायदाद की तरह अपनी अगली पीढ़ी को ट्रांसफर की जा रही है, पहले भी होता रहा है। लेकिन अब स्वरुप थोड़ा बदल गया है। जिनको राजनीति विरासत में मिल रही है, उनके सोचने और काम करने का नजरिया जरा हट कर है। वो अच्छे पढ़े लिखे हैं...उनके सोचने का तरीका अलग है। ऐसे में गांव के कुर्ता-पाजामा धारी नेताओं को कहां और कितनी जगह मिलेगी ये भगवान ही बेहतर जानते होंगे। लोकसभा चुनाव में अब ज्यादा दिन नहीं हैं...प्रधानमंत्री के दावेदारों की भी कमी नहीं है। कई छोटी-बड़ी पार्टियां अपनी-अपनी अहमियत जताने में लगी हुई हैं। हर कोई यही दावा कर रहा है कि अगर उनकी सरकार बनीं तो वे ये कर देंगे...वो कर देंगे। आज के नेता जनता के बीच कम और टीवी शो में ज्यादा दिखाई देते हैं। जो ईमानदार और साफ-सुथरी छवी वाले हैं उनका जनाधार नहीं है...जिनका जनाधार है उनके अपने-अपने एजेंडे हैं। वो या तो राज्य विशेष की बात करते हैं या फिर किसी दूसरे एजेंडे को लेकर आगे बढ़ने की बात करते हैं। पूरे देश को साथ लेकर बहुत ही कम नेता चलने की बात करते हैं। काश ! कोई ऐसा लीडर होता जो इस देश के हर तपके की बात करता...विकास के झोंके आम आदमी तक पहुंचाता ? एक सवाल मेरे मन में रह-रह कर उठता है कि देश में नेता तो इतने पैदा हो गए हैं। लेकिन क्या कोई ऐसा लीडर नहीं है, जो पंडित नेहरु और सरदार पटेल जैसी सोच और वृहत दृष्टिकोण रखता हो...जिसमें लाल बहादुर शास्त्री जैसी सादगी हो...इंदिरा गांधी जैसी दृढ़ इच्छा शक्ति हो ! जिसमें महात्मा गांधी या लोकनायक जयप्रकाश नायारण जैसा त्याग हो !

Tuesday, January 13, 2009

...और कितने फतवे ?

बांग्लादेश में इन दिनों एक फतवे पर चर्चा गर्म है। इस फतवे ने न सिर्फ महिलाओं बल्कि पुरुषों को भी सकते में डाल दिया है। चटगांव के फिरोजपुर इलाके में बारा मस्जिद है। मस्जिद की दीवार पर लिखा है 'इस सड़क पर महिलाओं का आना-जाना वर्जित है।' यानी इस सड़क पर महिलाएं नहीं चल सकती हैं क्योंकि सड़क के किनारे मस्जिद है। इस सड़क की रखवाली का जिम्मा है एक रिटायर्ड सैनिक सत्तार पर, जो लाठी लेकर पिछले एक महीने से सड़क की रखवाली कर रहे हैं। सत्तार खुद को पीर बताते हैं। इसी सड़क पर इलाके का डाकघर और कुछ लोगों के अपने घर भी हैं। अस्पताल के लिए भी इसी सड़क से होकर जाना होता है। किसी महिला की समझ में ये नहीं आ रहा है कि आखिर वो डाकघर या अस्पताल कैसे जाए? अपने घर का जरुरी सामान खरीदने बाज़ार कैसे जाए? कुछ अखबारों के मुताबिक अगर कोई महिला इस फतवे को नज़रअंदाज़ करते हुए सड़क पर निकलती है तो उसे धमकाया जाता है। स्कूल जानेवाली लड़कियों पर फब्तियां कसी जाती है। अच्छा है कि इस फतवे का दायरा बहुत सीमित है लेकिन अगर ये फिरोजपुर की बारा मस्जिद से निकल कर दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी पहुंच जाए तो महिलाओं के एक बड़े वर्ग का सड़कों पर निकलना ही दुर्भर हो जाए? अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब मलयेशिया में एक इस्लामी संगठन ने मुस्लिम समुदाय के लोगों पर योग करने पर रोक लगा दिया था। इनका तर्क था कि योग के दौरान कसरत के अलावे कुछ खास तरह की पूजा और मंत्रोच्चारण होता है, जो मुसलमानों के लिए प्रतिबंधित है। बांग्लादेश और मलयेशिया के बाद अब पाकिस्तान की बात। यहां भी अजब-गजब के फतवे जारी होते हैं। हाल ही में तालिबान ने अपनी पकड़ वाले इलाकों में एक फरमान जारी किया। इसमें लोगों से कहा गया कि वह अपनी बेटियों का निकाह आतंकवादियों से करें अथवा गंभीर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहें। पाकिस्तान के नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर में जबरन निकाह का यह अभियान चल रहा है। ऐसे न जाने कितने फतवे आते-जाते रहते हैं। लेकिन एक बात समझ में नहीं आती कि इस बदलते दौर में भी इस तरह
के फतवे आ कैसे जाते है ? इन्हें जारी करने वालों का मकसद क्या होता है? समाज को ठीक करना या समाज में अपनी अहमियत जताना? इतिहास में मैंने मुगल बादशाह अकबर की कहानी पढ़ी थी...हाल हीं में एक फिल्म आई जोधा-अकबर। दरअसल ये फिल्म अकबर और जोधा के ऊपर है जो उस वक्त की सामाजिक स्थिति को बड़ी अच्छी तरह से बयां करती है। अकबर ने जोधा से विवाह किया, जो राजपूत थी। अकबर के इस फैसले पर भी मुझे लगता है उस दौर में जरुर फतवे जारी हुए होंगे...लेकिन फतवा जारी करनेवालों में इतनी हिम्मत नहीं होगी की वो शहंशाह से लोहा लें या अकबर की आवाज के सामने उनकी आवाज़ को बल मिल सके। लेकिन शहंशाह की जगह कोई आम आदमी होता तो उसका क्या हाल होता सोचा जा सकता है! जितनी दुनिया एक हज़ार साल में नहीं बदली उतनी करीब सौ साल में बदली है...जितनी सौ साल में नहीं बदली उतनी दस साल में बदली है...और अब तो गति काफी तेज़ हो गई है। समय वक्त को पहचाने और उसके मुताबिक आगे बढ़ने का है...समाज़ को आगे ले जाने का है ...पीछे धकेलने का नहीं !

Monday, January 12, 2009

हाथियों पर मंदी की मार

मंदी की मार से क्या आदमी...क्या जानवर सभी परेशान हैं। भारत में सत्यम डूबी मंदी के चक्कर में...अमेरिका में 26 लाख लोगों की नौकरी गई मंदी के चक्कर में...यूरोप में लाखों लोगों की रोजी-रोटी गई मंदी के चक्कर में...तनख्वाह कम हो रही है मंदी के चक्कर में...नौकरियों से निकालने का सिलसिला जारी है- सब मंदी के चक्कर में। आर्थिक विकास का बुलबुला अब फूट चुका है। अब हर कोई भगवान से यही प्रार्थना कर रहे हैं- ये प्रभु इस मंदी से उबारो। मंदी का असर जिम्बाब्वे में तो इस कदर है कि वहां सैनिकों को खाने के लिए हाथी का मांस दिया जा रहा है यानी खाना तक देने के लिए पैसे नहीं हैं। हाथी का मांस दिए जाने के दो कारण हैं। एक तो हाथी का मांस वहां बहुत सस्ता है और दूसरा जिम्बाब्वे में हाथी आसानी से अपलब्ध हैं। कुछ दिनों पहले बीबीसी की वेब साइट पर जिम्बाब्वे में सैनिकों के खाने में हाथी का मांस दिए जाने की खबर छपी थी। एक अनुमान के मुताबिक जिम्बाब्वे में करीब एक लाख हाथी हैं और यह संख्या इतनी अधिक है कि आर्थिक संकट झेल रहे ज़िम्बाब्वे के जंगलों में इन्हें रखना कठिन साबित हो रहा है। हाथी का मांस परोसे जाने का सिलसिला पिछले साल जून में शुरु हुआ लेकिन हाल ही में इसमें बढ़ोत्तरी हुई है। ज़िम्बाब्वे के राष्ट्रीय जंगलों में 45 हज़ार हाथियों को रखने की सुविधा है यानी करीब 55 हज़ार हाथी ज्यादा हैं और यही तादाद वहां परेशानी पैदा कर रही है। जिम्बाब्वे के आर्थिक हालत फटेहाल हैं। जानकारों का कहना है कि देश में कई सरकारी कर्मचारियों की तनख़्वाह तो सिर्फ़ इतनी है कि उतने पैसों में वे घर से दफ्तर तक आना-जाना ही कर सकते हैं। ऐसे में समझा जा सकता है कि जानवरों का क्या हाल होगा? लोग कैसे अपना जीवन-यापन कर रहे होंगे? दुनिया के कुछ और हिस्सों में हो सकता है इससे भी और बदतर हालात हों!

Saturday, December 20, 2008

बाघ को वियाग्रा

बाघ को उत्तेजित करने के लिए वियाग्रा दिया जा रहा है। ये मजाक नहीं सच है और ऐसा चीन में हो रहा है। चीन के जियांग्सी प्रांत के जियुजियांग चिड़ियाघर में ऐसा किया जा रहा है। इस चिड़ियाघर में एक बाघिन है...यहां कोई बाघ नहीं है। इसलिए एक दूसरे चिड़ियाघर से एक बाघ लाया गया है। जिससे इन दोनों का मिलन करवाया जा सके और इनकी आबादी बढ़ाई जाए। लेकिन दूसरे चिड़ियाघर से आए बाघ के नया माहौल रास नहीं आ रहा है, इसलिए उनका अब तक मिलन नहीं हो पाया है। चिड़ियाघर के अधिकारियों का कहना है कि बाघिन की उम्र प्रजनन के लिए उपयुक्त है, इसलिए दोनों को ही सही खान-पान दिया जा रहा है। इसके साथ ही बाघ को उत्तेजित करने के लिए वियाग्रा भी दिया जा रहा है। चीन में चल रहे इस प्रयास का क्या नतीजा निकलेगा ये तो पता नहीं , पर अपने देश में भी बाघों की स्थिति अच्छी नहीं है।
आज से करीब सौ साल पहले भारत में करीब 40 हज़ार बाघ थे...लेकिन 2008 में इनकी तादाद घट कर 1, 411 हो गई है। भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक पिछले पांच साल में बाघों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है। 2002 में हुई गिनती के मुताबिक यहां कुल 3, 642 बाघ थे। भारत में विश्व के 40 फीसदी बाघ रहते हैं और 17 राज्यों में बाघों के लिए 23 संरक्षित क्षेत्र हैं। मध्य प्रदेश में इनकी संख्या सबसे अधिक 300 है। उत्तराखंड में 178, उत्तर प्रदेश में 109 और बिहार में 10 बाघ होने का अनुमान हैं। इसी तरह आंध्र प्रदेश में 95, छत्तीसगढ़ में 26, महाराष्ट्र में 103, उड़ीसा में 45 और राजस्थान में 32 बाघ होने का आकलन किया गया है। बाघ संरक्षण के तमाम उपायों के बावजूद इनकी आबादी बढ़ने के बजाए घट ही रही है। सिर्फ तमिलनाडु ही एक ऐसा राज्य है जहां बाघों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। पिछले पाँच साल में यहां बाघों की गिनती 60 से बढ़कर 76 हो गई है। प्रतिबंध के बावजूद भारत में बाघों का शिकार बड़े पैमाने पर किया जाता है। इन्हें खाल, हड़्डियों और अंगों के लिए मारा जाता है। बाघ की खाल से कीमती कपड़े बनाए जाते हैं जबकि, इसकी हड्डियों और अंगों का इस्तेमाल दवा बनाने में होता है। इनका सबसे बड़ा बाज़ार चीन है जहां इनके लिए साढ़े बारह हज़ार डॉलर तक मिल जाते हैं। जिस तरह से बाघों की संख्या घट रही है और यही चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब हम अपनी आनेवाली पीढ़ी को इनके बारे में सिर्फ चित्रों और एनिमेशन के जरिए ही बता पाएंगे? जैसा आज हम डायनासोर के बारे में बताते है। इस विलुप्त होते जानवर को बचाने के लिए सिर्फ सरकारी प्रयास ही काफी नहीं हैं ...हमें भी कुछ करना होगा? ताकि इन्हें भी जीने का पूरा हक मिले...इन्हें भी अपनी आबादी बढ़ाने का पूरा मौका मिले। अभी हमारे देश में चीन जैसी स्थिति नहीं आई है कि बाघों को वियाग्रा दिया जाए...लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हालात बेहतर हैं। वक्त संभलने का है...वक्त बाघों को बचाने का है।

Tuesday, December 16, 2008

आतंकवाद, आईएसआई और राजनीति

26 नवंबर को मुंबई पर हुए आतंकी हमले के बाद आतंकवाद और जनसंहार के हथियारों पर अमेरिकी आयोग की एक रिपोर्ट आयी। 'वर्ल्ड एट रिस्क' नाम की इस रिपोर्ट में कहा गया कि आतंकवाद की सभी सड़कें पाकिस्तान में एक-दूसरे से मिलती हैं। भारत ही नहीं दुनिया के ज्यादातर देश ऐसा ही सोचते हैं। खुद पाकिस्तान का दोस्त अमेरिका भी यही सोचता है। वहीं के सीनेटर जॉन केरी ने अपनी भारत यात्रा के दौरान कहा कि आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने पर पाकिस्तान को मिलने वाली तमाम अमेरिकी आर्थिक और सैन्य मदद पर अंकुश लगा दिया जाएगा। उनका यह भी कहना था कि इस बात के ठोस प्रमाण हैं कि मुंबई में आतंकी घटना को अंजाम देने के लिए हमलावर पाकिस्तान से ही आये थे। लेकिन क्या कैरी की इस चेतावनी का पाकिस्तान पर कोई असर पड़ेगा ? इस तरह के बयान भारत आकर अमेरिकी मंत्री और सीनेटर पहले भी देते रहे हैं। लेकिन होता क्या है...पूरी दुनिया को पता है। अमेरिका के पूर्व मंत्री कोलिन पावेल ने सीएनएन को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि 2001 में भारतीय संसद पर हमले के बाद पाकिस्तान ने हमें लश्कर के सफाए का आश्वासन दिया था, लेकिन वह वादा निभा नहीं सका। यानी अमेरिका को भी पाकिस्तान के वादे की हकीकत पता है। 26/11 के बाद भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में काफी खटास आई है। लेकिन इस सवाल का जवाब भी खोजना होगा कि क्या पाकिस्तानी हुकूमत आतंकी संगठनों की नकेल कस पाएगी? हाल ही में पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने एक इंटरव्यू में कहा कि आतंकी संगठनों के पहले आईएसआई से संबंध थे...अब नहीं हैं। पहली बार किसी पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने माना कि आईएसआई के आतंकी संगठनों से संबंध रहे हैं। पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था में सेना की भूमिका अहम है। सेना की दो खुफिया एजेंसियां आईएसआई और एमआई पाकिस्तान की व्यवस्था के भीतर एक व्यवस्था हैं। इनमें सेना के अफसर तैनात रहते हैं और उन पर सेनाध्यक्ष का सीधे नियंत्रण रहता है। पाकिस्तान में सत्ता का ढ़ाचा कुछ इस तरह है कि अगर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों हाथ मिलाकर एक तरफ भी हो जाएं, तो भी सेनाध्यक्ष अपनी चलाता है और अगर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच न बनती हो, फिर तो बिल्लियों के झगड़े में सेनाध्यक्ष बंदर की भूमिका में रहता है। पाकिस्तान में सब बोल रहे हैं। राष्ट्रपति जरदारी बोल रहे हैं...प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी बोल रहे हैं...आतंकी संगठनों के मुखिया बोल रहे हैं...सिर्फ एक आदमी नहीं बोल रहा है और वो हैं पाक आर्मी चीफ कियानी। पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष की खामोशी का हमेशा गहरा मतलब होता है। आखिर इतने डेवलपमेंट के बावजूद कियानी खामोश क्यों हैं? उनके दिमाग में क्या चल रहा है? वो आईएसआई के भी चीफ रहे हैं...यानी उनकी पकड़ आईएसआई पर काफी मजबूत होगी ? और आईएसआई के आतंकी संगठनों से रिश्ते की बात तो जगजाहिर है। खुद आईएसआई और पाक सेना के रिटायर्ड अफसर आतंकी संगठनों के कैंपो में नौजवानों को आतंक की ट्रेनिंग देते हैं। पूरी दुनिया को पता है कि पाकिस्तान के भीतर कहां और कितने आतंकि ट्रेनिंग कैंप चल रहे हैं। भारत के 26/11 के बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् ने पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा यानी जमात-उद-दावा पर प्रतिबंध लगा दिया। इस प्रतिबंध का मतलब साफ है कि दुनिया ने भारत के इस तर्क पर अपनी मुहर लगा दी कि जमात-उद-दावा और लश्कर -ए-तैयबा की जड़ें दो नहीं बल्कि एक ही हैं। लेकिन अब पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी के दबाव में झुकते हुए दावा के खिलाफ कार्रवाई का नाटक कर रहा है। इसके तहत इसके सभी दफ्तरों को सील किया जाना था। इसके खातों को सील किया जाना था और आतंकी करार दिए व्यक्तियों को गिरफ्तार कर उन पर मुकदमा चलाया जाना था। उनकी यात्रा, हथियार व धन जुटाने और मंसूबों को अमलीजामा पहनाने की क्षमता सीमित करनी थी...यानी उनके पर पूरी तरह से कतरने थे। लेकिन दिखाने के लिए कुछ गिरफ्तारियां हुईं...कुछ दफ्तर सील हुए...अब गिरफ्तार लोगों के छूटने का सिलसिला भी साथ ही शुरू हो गया है। अगर अंतर्राष्ट्रीय दबाव में कुछ कड़े कदम उठाए भी गए तो ये आतंकी संगठन अपना नाम और चोला बदल कर वहां काम करते रहेंगे...क्योंकि उन्हें एक ऐसी व्यवस्था से समर्थन मिल रहा है जिसपर वहां किसी लोकतांत्रिक ढ़ंग से चुनी गई सरकार का कोई बस नहीं चलता। लश्कर पर प्रतिबंध लगा तो जमात-उद-दावा बना और इस पर प्रतिबंध लगा तो नाम बदलकर किसी और संगठन के रुप में लश्कर पाकिस्तान की जमीन से आतंक की फसल तैयार करता रहेगा। लश्कर पर ये कोई पहली बार प्रतिबंध नहीं लगा है। 2001, 2002 और 2005 में प्रतिबंध लग चुके हैं...लेकिन इसके लोग अपना काम पहले की तरह ही कर रहे हैं।पड़ोस में तैयार हो रही आतंक की फसल को नष्ट करने के लिए तो इसकी जड़ों में मट्ठा डालना होगा। आईएसआई के आतंकी संगठनों से रिश्तों को हमेशा के लिए खत्म करना होगा। इसके आतंकी संगठनों से रिश्ते को उजागर करना होगा। आईएसआई के स्थाई रुप से पर कतरने होंगे। ये सिर्फ भारत को नहीं पूरी अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी को करना होगा...नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब उनके घर भी आतंक की आग के लपेटे में होंगे। क्योंकि आतंक का न तो कोई मजहब होता है और न ही दीवार।

Monday, December 15, 2008

खतरे में दुनिया

आज दुनिया में पाकिस्तान की पहचान क्या है ? आतंकवादियों का पनाहगार देश...रहने के लिहाज से दुनिया का सबसे खतरनाक देश या फिर कुछ और ! पाकिस्तान पर ऐसे आरोप लगते रहते हैं। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन ने 14 दिसंबर को इस्लामाबाद में कहा- "ब्रिटिश पुलिस ने हाल के वर्षों में हुई बड़ी आतंकी साजिशों की जांच के दौरान तीन चौथाई मामलों में पाकिस्तान स्थित अल-कायदा को शामिल पाया"। भारत ही नहीं पूरी दुनिया आतंकवाद का कनेक्शन किसी-न-किसी रुप में पाकिस्तान से देख रही है। हाल ही में एक किताब आई है... द मैन फ्राम पाकिस्तान-द ट्रू स्टोरी ऑफ वल्डर्स मोस्ट डेंजरस न्यूक्लियर स्मगलर ए क्यू खान। इस किताब में दावा किया गया है कि अमेरिका में 11 सितंबर के हमले से महज़ एक महीने पहले पाकिस्तान के दो परमाणु वैज्ञानिकों ने अलकायदा नेता ओसामा बिन लादेन से मुलाकात की थी और परमाणु हथियारों की पेशकश की। ये दोनों वैज्ञानिक ए क्यू खान के काफी करीबी बताए जाते हैं। इस किताब में कहा गया है कि चौधरी अब्दुल मजीद और सुल्तान बशिरुद्दीन महमूद अगस्त 2001 में कंधार में तालिबान के मुख्यालय गए थे और तीन दिन बिन लादेन के साथ बिताए थे, जो व्यापक विनास के हथियार हासिल करने का इच्छुक था। इस किताब से पहले अमेरिकी संसदीय समिति की एक रिपोर्ट आई थी। जिसमें कहा गया कि आतंकी संगठन अगले पांच साल के भीतर परमाणु हथियार से हमले की योजना बना रहे हैं। समिति ने ये भी कहा है कि पाकिस्तान के परमाणु हथियार दुनिया के लिए खतरा बने हुए हैं। इससे पहले संयुक्त राष्ट्र के न्यूक्लियर मोनिटरिंग एजेंसी में इस बात का खुलासा किया गया था कि पाकिस्तान से लगातार परमाणु तकनीक लीक हो रही है। इसका खुलासा आईएईए के दस्तावेजों से हुआ। अब क्या बड़ा सवाल ये है कि क्या परमाणु हथियार आतंकियों के हाथ लग चुके हैं ? अगर परमाणु हथियार आतंकियों के हाथ लग चुके हैं तो उनका अगला निशाना कौन होगा? उसका कंट्रोल किसके पास है ? एक ये भी सवाल आ रहा है कि कहीं इन आतंकियों के परमाणु हथियार पाकिस्तान के परमाणु हथियारों से ज्यादा ताकतवर तो नहीं हैं ? पाकिस्तान के पास जो परमाणु हथियार हैं वो पूरी तरह से सुरक्षित हैं या नहीं ? भारत पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों के हमेशा निशाने पर रहा है। इनके हमले लगातार बढ़ रहे हैं यानी सबसे ज्यादा खतरा भारत के सामने हैं। पाकिस्तानी जमीन से उपजते आतंकवाद की आग में भारत सबसे अधिक झुलसा है। ऐसे में भारत को जोश से नहीं पूरे होश से काम लेना होगा...क्योंकि दोस्त बदले जा सकते हैं पड़ोसी नहीं। इतिहास बनाया या बदला जा सकता है...भूगोल नहीं।